रब्बा सच्चिया तूँ ते आखिया सी...  

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आज आप सब के साथ फ़ैज़ की शख़सियत का एक मुख्तलिफ़ पहलू बाँटने जा रही हूँ. एक ऐसा पहलू जिससे बहुत कम लोग वाक़िफ़ होंगे. उर्दू शेर-ओ-सुख़न में फ़ैज़ को जो मुक़ाम हासिल है उसे तो पूरी दुनिया सलाम करती है, पर क्या आप जानते हैं फ़ैज़ ने पंजाबी और अंग्रेज़ी में भी लिखा है.

आज आपके लिये फ़ैज़ की लिखी हुई एक पंजाबी नज़्म ले कर आयी हूँ "रब्बा सच्चिया तूँ ते आखिया सी" जो उनके मजमुए "नक्श-ए-फ़रियादी" से ली है. यूँ तो फ़ैज़ ने पंजाबी में बहुत ज़्यादा नहीं लिखा है, क्यूँकि उनका मानना था कि पंजाबी में इतना कुछ अच्छा पहले ही लिखा जा चुका है कि उनके सामने वो और क्या लिखें. फ़ैज़ बुल्लेशाह के लेखन से बहुत प्रभावित थे.

भाषा भले ही बदली हो पर फ़ैज़ के तेवर नहीं बदले. अपनी इस नज़्म में फ़ैज़ ने भगवान से शिकायत करते हुए कहा है कि उसने इन्सान को इस धरती का राजा बना के भेजा था पर उसे यहाँ भेजने के बाद वो इन्सान को बिलकुल भूल गया, कभी इस बात कि कोई खोज-ख़बर नहीं ली कि वो इस धरती पर कैसे जी रहा है. आइये पढ़ते हैं फ़ैज़ की सच्चे रब से की हुई इस अर्ज़ी को.


रब्बा सच्चिया तूँ ते आखिया सी
जा ओए बंदिया जग दा शाह हैं तूँ
साडियाँ नेहमताँ तेरियाँ दौलताँ ने
साडा नैब ते आलीजाह है तूँ

एस लारे ते टोर कद पुछिया ई
कीह ऐस नमाणे ते बीतियाँ ने
कदी सार वी लई ओ रब साइयाँ
तेरे शाह नाल जग की कीतियाँ ने

किते धौंस पुलिस सरकार दी ए
किते धान्दली माल पटवार दी ए
ऐंवें हडडाँ'च कल्पे जान मेरी
जिंवें फाही च' कूंज कुरलावन्दी ए
चंगा शाह बनाया ई रब साइयाँ
पोले खान्देयाँ वार न आंवदी ए

मैंनूँ शाही नईं चाहीदी रब मेरे
मैं ते इज़्ज़त दा टुक्कड़ मंगनाँ हाँ
मैंनूँ ताँहग नईं, महलाँ माड़ीयाँ दी
मैं ते जीवीं दी नग्गर मंगनाँ हाँ

मेरी मन्ने ते तेरियाँ मैं मन्नां
तेरी सौंह जे इक वी गल्ल मोडां
जे इह मंग नईं पुचदी तैं रब्बा
फेर मैं जावाँ ते रब कोई हौर लोडां

-- फ़ैज़

इन्टरनेट पर मौजूद इस नज़्म के अंग्रेज़ी अनुवाद और जो थोड़ी बहुत पंजाबी हमें समझ आती है उसे मिला जुला कर ये हिंदी अनुवाद करने की कोशिश करी है हमने, शायद आपको ये नज़्म समझने में मदद मिले. हालांकि इस अनुवाद में सुधार की पूरी गुंजाइश है और आप सब से ये गुज़ारिश है कि अगर कोई इसका बेहतर हिंदी अनुवाद कर सकता है तो कृपया अनुवाद कर के हमें भेज दे. तब तक इसी अनुवाद से इस नज़्म को समझने कि कोशिश करिये :)

हे सच्चे परमेश्वर, तुमने ही कहा था
जाओ, ओ आदमी, तुम पृथ्वी के राजा हो
हमारी कृपा और आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं
तुम हमारे डिप्टी और वाइसराय हो

मुझे इस वादे के साथ भेजने के बाद क्या तुमने कभी पूछा
कि मुझ गरीब पे क्या बीत रही है ?
ओ दुनिया के रचयिता, क्या तुमने कभी ये जाने की कोशिश करी
कि तुम्हारे इस राजा के साथ इस दुनिया ने क्या करा ?

कहीं पुलिस वालों का आतंक है
कहीं राजस्व विभाग में धोखाधड़ी है
मेरी आत्मा मेरी हड्डियों की बेडि़यों में जकड़ी हुई है
जाल में फंसे एक चीखते हुए पक्षी की तरह.
अच्छा राजा बनाया मुझे ओ भगवान तुमने
मैंने इतनी मार खायी है कि मैं उसकी गिनती भी नहीं कर सकता

मुझे शासन नहीं चाहिये ओ मेरे भगवान
मैं सिर्फ इज्ज़त से कमाई हुई रोटी चाहिये
मुझे किसी महल की ख़्वाहिश नहीं
मुझे सिर्फ़ सर छुपाने के लिये एक छत चाहिये

अगर आप मेरा अनुरोध स्वीकार करेंगे तो मैं भी आपकी बात मानूँगा
आपकी कसम मैं किसी भी बात से नहीं मुकरूँगा
लेकिन, हे भगवान, अगर तुम्हें ये दलील स्वीकृत नहीं है
तो फिर मैं जाऊँ और किसी और भगवान को खोज के लाऊँ

जितना मुख्तलिफ़ फ़ैज़ का ये अंदाज़ है उतना ही जुदा है नहीद सिद्दीकी जी का फ़ैज़ को श्रद्धांजलि देने का ये तरीका. आप भी देखिये और आनंद लीजिये फ़ैज़ की इस नज़्म पर मंत्रमुग्ध कर देने वाले इस कत्थक नृत्य का.



इस ख़ूबसूरत प्रस्तुति के बाद आइये सुनते हैं इस नज़्म को टीना सानी जी की भावपूर्ण आवाज़ में, "कोक स्टूडियो" नाम के एक पाकिस्तानी टेलीविज़न कार्यक्रम में दिये हुए लाइव परफौरमेंस से.


इक तमन्ना सताती रही रात भर...  

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तमाम शब दिल-ए-वहशी तलाश करता है
हर इक सदा में तेरे हर्फ़-ए-लुत्फ़ का आहंग
हर एक सुबह मिलाती है बार-बार नज़र
तेरे दहन से हर इक लाला-ओ-गुलाब का रंग
-- फ़ैज़

ख़ुशामदीद ! फ़ैज़ की महफ़िल-ए-शेर-ओ-सुख़न में एक बार फिर आप सब का स्वागत है. आज आप सब के लिये फ़ैज़ के मजमुए "शाम-ए-शहर-ए-याराँ" से एक बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल चुन के लाये हैं. ये ग़ज़ल फ़ैज़ ने अपने दोस्त और उर्दू के मशहूर शायर मख़दूम मोहिउद्दीन की याद में उनकी ही ग़ज़ल से प्रेरित होकर लिखी थी.

मख़दूम भी फ़ैज़ के साथ प्रोग्रेस्सिव राइटर असोसिएशन (पी.डब्लू.ए) के प्रमुख सदस्यों में से एक थे और मार्क्सवादी विचारधारा को मानने वाले एक तरक्की-पसंद शायर थे. मख़दूम ने १९४६ - ५१ तक चले "तेलंगाना आन्दोलन" में बढ़ चढ़ के हिस्सा भी लिया था.

आइये पहले पढ़ते हैं मख़दूम जी की लिखी हुई ग़ज़ल और उसे सुनते हैं छाया गांगुली जी की आवाज़ में, इस ग़ज़ल को मुज़फ्फ़र अली द्वारा निर्देशित और फ़ारुख शेख़ एवं स्मिता पाटिल अभिनीत फिल्म "गमन" में इस्तेमाल किया गया था.

आप की याद आती रही रात भर
चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर

रात भर दर्द की शमा जलती रही
गम की लौ थरथराती रही रात भर

बाँसुरी की सुरीली सुहानी सदा
याद बन बन के आती रही रात भर

याद के चाँद दिल में उतरते रहे
चाँदनी डगमगाती रही रात भर

कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा
कोई आवाज़ आती रही रात भर

-- मख़दूम मोहिउद्दीन


और अब पढ़ते हैं फ़ैज़ साब की इस ग़ज़ल को जो उन्होंने मख़दूम की ग़ज़ल से प्रेरित हो कर लिखी. इस ग़ज़ल को हम सुनेंगे "पी.टी.वी." पर आयोजित एक संगीत-गोष्ठी से पाकिस्तान की मशहूर ग़ज़ल गायिका टीना सानी जी की आवाज़ में.

उम्मीद है आपको भी आज की ग़ज़लें उतनी ही पसंद आयेंगी जितनी की हमें पसंद हैं. कैसी लगीं बताइयेगा ज़रूर...

"आपकी याद आती रही रात भर"
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर

गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन *
कोई तस्वीर गाती रही रात भर

फिर सबा * साया-ए-शाख़े-गुल * के तले
कोई किस्सा सुनाती रही रात भर

जो ना आया उसे कोई ज़ंजीर-ए-दर *
हर सदा पर बुलाती रही रात भर

एक उम्मीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात भर

मॉस्को, सितम्बर १९७८

अपने अफ़कार की, अशआ'र की दुनिया है यही...  

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ये खूँ की महक है के लब-ए-यार की ख़ुशबू
किस राह की जानिब से सबा आती है देखो
गुलशन में बहार आई, के ज़िन्दां * हुआ आबाद
किस सिम्त * से नग़मों की सदा आती है देखो
-- फ़ैज़



आज फ़ैज़ की इस महफ़िल में आप सब के लिये जो नज़्म ले कर आयी हूँ उसका शीर्षक है "मौज़ू-ए-सुख़न", जो उनके पहले संग्रह "नक्श-ए-फ़रियादी" से ली है. ये वो वक़्त था जब फ़ैज़ रूमानी शायरी ज़्यादा लिखा करते थे, हालाँकि हक़ीक़त और सामाजिक परिवेश और परिस्थितियों से उस वक़्त भी उनकी रचनायें अछूती नहीं रहा करती थीं, जैसा की इस नज़्म के बाद के हिस्से में भी देखा जा सकता है. पर ये फ़ैज़ के कलम का ही जादू था की वो इस ख़ूबसूरती से रूमान, फंतासी, हक़ीक़त और क्रांति को सम्मिश्रित करते थे की आज भी उन्हें पढ़ने वाला बरबस ही "वाह" कर उठता है...

इस नज़्म में उन्होंने बड़ी ही ख़ूबसूरती से एक शायर के दिल का हाल बताया है कि एक तरफ़ तो बेपनाह ख़ूबसूरत हसीनायें है और दूसरी तरफ़ भूख उगाते खेत और चूर हो कर बिख़रते ख़्वाब... वो ख़्वाब जो लोगों को जीने का हौसला देतें हैं... तो वो शायर क्यूँ ना उस ख़ूबसूरती के बारे में लिखे उन शोख हसीनाओं और उन ख़्वाबीदः आँखों और रंगीन रुखसार के बारे में लिखे... इससे बेहतर कोई और मौज़ूँ क्या होगा उसकी शायरी का.

आइये अब पढ़ते हैं और फिर सुनते हैं ये ख़ूबसूरत सी नज़्म बेग़म आबिदा परवीन जी की आवाज़ में -


गुल हुई जाती है अफ़सुर्दः * सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्म-ए-महताब * से रात
और मुश्ताक़ * निगाहों की सुनी जायेगी
और उन हाथों से मस * होंगे ये तरसे हुए हाथ

उनका आँचल है, कि रुखसार, कि पैराहन * है
कुछ तो है जिससे हुई जाती है चिलमन रंगीं
जाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम * घनी छाँव में
टिमटिमाता है वो आवेज़ः * अभी तक कि नहीं

आज फिर हुस्न-ए-दिलआरा * की वही धज होगी
वही ख़्वाबीदः * सी आँखें, वही काजल की लकीर
रंगे-रुख़सार पे हल्का सा वो गाज़े * का ग़ुबार
संदली हाथ पे धुंधली सी हिना की तहरीर *

अपने अफ़कार * की, अशआ'र की दुनिया है यही
जाने-मज़मूँ * है यही, शाहिद-ए-मानी * है यही

आज तक सुर्ख़-ओ-सियह सदियों के साये के तले
आदम-ओ-हव्वा की औलाद पे क्या गुज़री है
मौत और जीस्त की रोज़ान: सफ़आराई * में
हम पे क्या गुज़रेगी, अजदाद * पे क्या गुज़री है

इन दमकते हुए शहरों की फ़रावाँ मख़लूक़ *
क्यूँ फ़क़त मरने की हसरत में जिया करती है
ये हसीं खेत, फटा पड़ता है जोबन जिनका
किसलिए इनमें फ़क़त भूख उगा करती है

ये हर इक सिम्त पुर-असरार * कड़ी दीवारे
जल बुझे जिनमें हज़ारों की जवानी के चिराग़
ये हर इक गाम पे उन ख़्वाबों के मक़तलगाहें *
जिनके परतौ * से चिरागाँ हैं हज़ारों के दिमाग़

ये भी हैं ऐसे कई और भी मज़मूँ होंगे
लेकिन उस शोख़ के आहिस्ता से खुलते हुए होंठ
हाय उस जिस्म के कमबख्त दिलआवेज़ * ख़ुतूत
आप ही कहिये कहीं ऐसे भी अफ्सूँ * होंगे

अपना मौज़ू-ए-सुख़न * इनके सिवा और नहीं
तब-ए-शायर * का वतन इनके सिवा और नहीं


आज इक हर्फ़ को फिर ढूँढता फिरता है ख़्याल...  

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दिल रहीन-ए-ग़म-ए-जहाँ * है आज
हर नफ़ज़ * तश्न-ए-फुगाँ * है आज
सख्त वीरान है महफ़िल-ए-हस्ती
ऐ ग़म-ए-दोस्त तू कहाँ है आज
-- फैज़ 


फैज़ की महफ़िल में एक बार फिर आप सबका तह-ए-दिल से इस्तक़बाल है. आज तक आपको फैज़ की शायरी के अनेकों रंगों से रु-बा-रु करवा चुकी हूँ पर आज रोमांसवाद और देशप्रेम से हट कर जो नज़्म चुन के लायी हूँ आप सब के लिये वो एक शायर की उस कैफ़ियत को दर्शाती है जब वो अपने ख़्यालों को कागज़ पर उतारना तो चाहताहै पर उसे वो अक्षर... वो शब्द नहीं मिलते जो उसके ख़्यालों को, उसकी भावनाओं को सही शक्ल दे पायें...

"फैज़" अपनी शायरी की तरह ही व्यक्तिगत तौर पर भी एक बेहद मीठे इन्सान थे. उन्हें कभी किसी ने ऊँचा बोलते नहीं सुना चाहे वो रोज़ मर्रा की बातचीत हो या फिर मुशायरों में पढ़े जाने वाले उनके शेर. फैज़ के बारे में कहीं पढ़ा था की वो मुशायरों में भी इस तरह अपने शेर पढ़ते हैं कि जैसे उनके होंठों से अगर ज़रा ऊँची आवाज़ निकल गई तो ना जाने कितने मोती चकनाचूर हो जायेंगे. वो सेना में कर्नल रहे, जहाँ किसी नर्मदिल अधिकारी की गुंजाइश नहीं होती. उन्होंने कॉलेज में प्रोफेसरी करी जहाँ लड़के प्रोफ़ेसर तो प्रोफ़ेसर शैतान तक को अपना स्वभाव बदलने पर मजबूर कर दें. उन्होंने रेडियो में नौकरी करी, पत्रकारिता जैसा जोखिम भरा पेशा अपनाया फिर भी उनका ये स्वभाव ज्यूँ का त्यूँ रहा और फिर जब पाकिस्तान सरकार ने इस देवता स्वरुप व्यक्ति पर हिंसात्मक विरोध का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया तब भी मेजर मोहम्मद इसहाक़ ("फैज़" के जेल के साथी) के कथानुसार,

"कहीं पास-पड़ोस में तू-तू मैं-मैं हो, दोस्तों में तल्ख़-कलामी हो, या यूँ ही किसी ने त्योरी चढ़ा रखी हो, "फैज़" को तबियत ज़रूर ख़राब हो जाती थी और इसके साथ ही शायरी की कैफ़ियत (मूड) भी काफ़ूर हो जाती थी"

आज की ये ख़ूबसूरत सी नज़्म उनके संग्रह "शाम-ए-शहर-ए-याराँ" से ले गई है... पहले इसे पढ़ते हैं फिर सुनते हैं शशि कपूर और सुरेश वाडेकर जी की आवाज़ में, जिसे फिल्म "मुहाफ़िज़ - इन कस्टडी" में इस्तेमाल किया गया था. ये फिल्म अनीता देसाई जी के बुक्कर समान के लिये नामांकित उपन्यास "इन कस्टडी" पर आधारित है जिसके मुख्य पात्र हैं उर्दू के एक शायर "नूर". कहने की ज़रुरत नहीं की फिल्म बेहद अच्छी है और इसमें फैज़ की बहुत सी नज़्में इस्तेमाल करी गई हैं. आपने नहीं देखी तो ज़रूर देखिये एक बार. पर फिलहाल फैज़ साहब के पास लौटते हैं और पढ़ते हैं ये ख़ूबसूरत सी नज़्म.


[ 1 ]

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँढता फिरता है ख़्याल
मध भरा हर्फ़ कोई, ज़हर भरा हर्फ़ कोई
दिलनशीं हर्फ़ कोई, क़हर भरा हर्फ़ कोई
हर्फ़-ए-उल्फ़त कोई दिलदार-ए-नज़र हो जैसे
जिस से मिलती है नज़र बोसा-ए-लब की सूरत
इतना रौशन के सर-ए-मौजा-ए-ज़र * हो जैसे
सोहबत-ए-यार में आगाज़-ए-तरब * की सूरत
हर्फ़-ए-नफ़रत कोई शमशीर-ए-ग़ज़ब * हो जैसे
ता-अबद * शहर-ए-सितम जिससे तबाह हो जाएँ
इतना तारीक़ * के शमशान की शब हो जैसे
लब पे लाऊँ तो मेरे होंठ सियह हो जाएँ

[ 2 ]

आज हर सुर से हर इक राग का नाता टूटा
ढूँढती फिरती है मुतरिब * को फिर उसकी आवाज़
जोशिश-ए-दर्द * से मजनूँ के गरेबाँ की तरह
आज हर मौज हवा से है सवाली ख़िलक़त *
ला कोई नग़मा कोई सौत * तेरी उम्र दराज़
नौहा-ए-ग़म * ही सही शोर-ए-शहादत * ही सही
सूरे-महशर * ही सही बाँग-ए-क़यामत * ही सही

जुलाई, 1977




नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही...  

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हज़ार दर्द शब-ए-आरज़ू की राह में हैं
कोई ठिकाना बताओ के काफ़िला उतरे
क़रीब और भी आओ के शौक़-ए-दीद * मिटे
शराब और पिलाओ के कुछ नशा उतरे
-- फैज़

फैज़ की इस महफ़िल में आज उनकी एक बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल "नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही" ले कर आयें हैं, ये ग़ज़ल उनकी असंकलित ग़ज़लों की श्रेणी में आती है, असंकलित इसलिए कि उनके किसी भी संग्रह में नहीं पायी जाती है. सुप्रसिद्ध गायिका बेग़म आबिदा परवीन ने फैज़ की इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ से नवाज़ा था, "फैज़ बाय आबिदा" नाम के एक एल्बम के लिये. तो आज हम इस ग़ज़ल को पढ़ेंगे भी और सुनेंगे भी पर उससे पहले चंद बातें इस ग़ज़ल, फैज़ की लेखनी और फैज़ के बारे में.

फैज़ की लेखनी में जो टशन था, बात को कहने का जो अंदाज़ था वो इस ग़ज़ल में बड़े ही बेहतरीन तरीक़े से उभर के आया है. अपनी बात को कहने का ये अंदाज़ ही फैज़ को उनके ज़माने के अन्य शायरों से जुदा करता है और यही कारण है कि उर्दू शेर-ओ-सुख़न के इतिहास में फैज़ को एक मुख्तलिफ़ और बेहद ऊँचा मक़ाम हासिल है, जिसे पिछले तकरीबन पचास सालों में भी कोई नहीं छू पाया है.

उर्दू के एक आलोचक मुमताज़ हुसैन के कथनानुसार -

"उसकी शायरी में अगर एक परम्परा क़ैस (मजनूं) की है तो दूसरी मन्सूर ** की. "फैज़" ने इन दोनों परम्पराओं को अपनी शायरी में कुछ इस प्रकार समो लिया है कि उसकी शायरी स्वयं एक परम्परा बन गई है. वह जब भी महफ़िल में आया, एक छोटी-सी पुस्तक, एक क़तआ, ग़ज़ल के कुछ शेर, कुछ यूँ-ही सा काव्य-अभ्यास और कुछ क्षमा-याचना की बातें ले कर आया, लेकिन जब भी आया और जैसे भी आया, खूब आया..."

** एक प्रसिद्ध ईरानी वाली जिनका विश्वास था की आत्मा और परमात्मा एक ही हैं और उन्होंने 'अनल-हक़' (सोऽहं - मैं ही परमात्मा हूँ) की आवाज़ उठाई थी. उस समय के मुसलमानों को उनका यह नारा अधार्मिक लगा और उन्होंने उन्हें फांसी दे दी.


नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू * ही सही
नहीं विसाल * मयस्सर * तो आरज़ू ही सही

न तन में ख़ून फ़राहम * न अश्क़ आँखों में
नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब * है बे-वज़ू * ही सही

यही बहुत है के सालिम * है दिल का पैराहन *
ये चाक़-चाक़ * गरेबाँ बे-रफ़ू * ही सही

किसी तरह तो जमे बज़्म * मयक़दे वालों *
नहीं जो बादा-ओ-साग़र * तो हा-ओ-हू * ही सही

गर इन्तज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल
किसी के वादा-ए-फ़र्दा * की गुफ़्तगू * ही सही

दयार-ए-ग़ैर * में महरम * अगर नहीं कोई
तो 'फ़ैज़' ज़िक्र-ए-वतन अपने रू-ब-रू * ही सही



आइये अब इस ग़ज़ल को सुनते हैं बेग़म आबिदा परवीन जी की आवाज़ में, उम्मीद है आपको भी पसंद आएगी -  



जो रुके तो कोहे-गराँ थे हम, जो चले तो जाँ से गुज़र गये...  

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दूर जा कर क़रीब हो जितने
हमसे कब तुम क़रीब थे इतने
अब न आओगे तुम न जाओगे
वस्ल-ओ-हिज्राँ * बहम * हुए कितने
-- फैज़


यूँ तो अपनी शायरी में और अपने चाहने वालों के दिलों में फैज़ आज भी ज़िन्दा हैं और हमेशा रहेंगे पर इस दुनिया से रुख़सत लिये हुए आज उन्हें पूरे छब्बीस साल हो गये. आज फैज़ की छब्बीसवीं बरसी पर आइये उन्हें याद करते हैं और एक छोटी सी श्रद्धांजलि देते हैं.

20 नवम्बर 1984 की दोपहर एक लम्बी बीमारी के बाद इस दुनिया को अलविदा कर फैज़ की क़लम और फैज़ दोनों हमेशा के लिये ख़ामोश हो गये... पर उनके इन्तेक़ाल के इतने बरस गुज़र जाने के बाद भी फैज़ की शायरी आज भी साँस लेती है और उनकी रूह आज भी ताज़ातन है हम सबके दिलों में. फैज़ को जितनी शोहरत अपने जीवनकाल में मिली उससे कहीं ज़्यादा इज्ज़त और शोहरत उसके बाद मिली.

फैज़ की शायरी एक बाक़ायदा "स्कूल ऑफ़ थॉट" का दर्जा रखती है. उर्दू शायरी से लगाव रखने वाला शायद ही कोई ऐसा शक्स होगा जो फैज़ की शायरी से प्रभावित ना हुआ हो. फिर चाहे वो हम और आप हों या कि आज के दौर के नामी गिरामी शायर और लेखक. आइये सुनते हैं जावेद अख्तर साहब, गुलज़ार साहब और ज़ेहरा नेगहा जी का फैज़ के बारे में क्या कहना है.




फैज़ की शायरी सिर्फ़ शायरी नहीं है उसका एक ख़ास मतलब है उनके पाठकों के लिये. वह सही मायनों में ज़िन्दगी की शायरी है - उसकी समग्रता का गर्माहट-भरा राग. लोग उसे दिल की गहराइयों से प्यार करते हैं और ज़िन्दगी के अहम मोड़ों पर उससे रौशनी पाते हैं.

फैज़ को श्रद्धांजलि देने की इस कड़ी में आइये आज पढ़ते हैं उनकी एक बेहद ख़ूबसूरत नज़्म "ढाका से वापसी पर" उनके कविता संग्रह "शाम-ए-शहर-ए-याराँ" से और उसके बाद इसी नज़्म को दो अलग लोगों से दो अलग अंदाज़ में सुनेंगे.


हम के ठहरे अजनबी इतनी मदारातों * के बाद
फिर बनेंगे आशना * कितनी मुलाक़ातों के बाद

कब नज़र में आयेगी बे-दाग़ सब्ज़े * की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

थे बहुत बे-दर्द लम्हें ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ * के
थीं बहुत बे-महर * सुबहें मेहरबाँ रातों के बाद

दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल * ने मोहलत * ही न दी
कुछ गिले-शिकवे भी कर लेते मुनाजातों * के बाद

उन से जो कहने गये थे "फ़ैज़" जाँ सदक़ा * किये
अनकही ही रह गई वो बत सब बातों के बाद

1974
शाम-ए-शहर-ए-याराँ

आइये अब इस नज़्म को सुनते हैं नय्यारा नूर जी की दिलकश आवाज़ में -


और अब इसी नज़्म का एक बिलकुल अलग अंदाज़ मुज़फ्फर अली जी के एल्बम "पैग़ाम-ए-मोहब्बत" से. मुज़फ्फ़र साहब ने बिलकुल अलग तरह का प्रयोग किया है इस नज़्म के साथ, उसे क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम की बंगाली कविता "मोनी पोड़े आज शे कोन" के साथ मिला कर. अब इसे फैज़ और नज़रुल के कलम का जादू कहिये या मुज़फ्फ़र साहब के संगीत की जादूगरी या फिर उस्ताद मोईन ख़ान और शोर्जू भट्टाचार्य जी की आवाज़ का कमाल कि दोनों ही गीत कुछ ऐसे घुल मिल गये हैं आपस में कि उर्दू और बंगाली का अंतर ही मिट गया है. सुनिये और ख़ुद ही महसूस कीजिये जो हम शब्दों में समझा नहीं पा रहे शायद...


चलते चलते बस इतना ही कहूँगी कि फैज़ को इतना पढ़ने समझने के बाद भी लगता है पता नहीं कितना समझ पायें हैं उनको, और जो भी समझा है क्या सही समझा है, क्या वही समझा है जो वो कहना चाह रहे थे...


जो रुके तो कोहे-गराँ * थे हम, जो चले तो जाँ से गुज़र गये
रहे-यार हमने क़दम क़दम तुझे यादगार बना दिया...


हमीं से सुन्नत-ए-मंसूर-ओ-क़ैस ज़िन्दा हैं...  

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हमारे दम से है कू-ए-जुनूँ * में अब भी ख़जल *
अबा-ए-शेख़-ओ-क़बा-ए-अमीर-ओ-ताज-ए-शही *
हमीं से सुन्नत-ए-मंसूर-ओ-क़ैस * ज़िन्दा हैं
हमीं से बाक़ी है गुलदामनी-ओ-कजकुलही *

-- फैज़

आज आप सब के लिये फैज़ की एकदम अलग तरह की नज़्म से ले कर आये हैं. रोमांसवाद से पूर्णतयः मुक्त जिसे पढ़ कर आप शायद समझ सकें की फैज़ के कलम की ताकत से पाकिस्तान की सरकार किस कदर खौफ़ खाती थी. फैज़ की शायरी में जो पूरी अवाम के जज़्बातों को एक साथ झंकझोर देने की कला थी उसी के चलते उन्हें अपने जीवनकाल में तमाम बार जेल हुई और देश निकाला मिला... क्यूँकि सरकार को डर था की गर फैज़ यूँ ही लिखते रहे तो अवाम बाग़ी हो जायेगी.

उर्दू क्लासिकल शायरी के मुहावरों और हुस्न के रसाव से विपरीत एकदम अलग तरह की उपमाओं और प्रतीकों से सजी आज की नज़्म "कुत्ते" उनके पहले कविता संग्रह "नक्श-ए-फ़रियादी" से ली है. यहाँ कुत्ते उन बेघर लोगों के प्रतीक हैं, जो अपनी रातें फुटपाथ पर बिताते हैं, आवारा घूमते हैं, ज्यों-त्यों पेट भरते हैं और सबकी फटकार सहते हैं. इनमें ज़िन्दगी का यथार्थ भी है और ज़िन्दगी को बदलने की प्रबल इच्छा भी है. यह शायरी जहाँ मध्य वर्ग के असंतुष्ट युवकों को पसंद आती है, वहाँ उच्च वर्ग को भी अखरती नहीं क्यूँकि ये आवारा कुत्ते कभी बगावत नहीं करते, दुम हिलाओ तो ज़्यादा-से-ज़्यादा भौंकते हैं और फिर चुप हो जाते हैं.

ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
के बख्शा गया जिनको ज़ौक-ए-गदाई *
ज़माने की फटकार सरमाया * इन का
जहाँ भर की दुत्कार इनकी कमाई

न आराम शब की न राहत सवेरे
गिलाज़त * में घर, नालियों में बसेरे
जो बिगड़ें तो इक दूसरे से लड़ा दो
ज़रा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो
ये हर एक की ठोकरें खाने वाले
ये फ़ाकों * से उकता के मर जाने वाले

ये मज़लूम मखलूक * गर सर उठाये
तो इन्सान सब सरकशी * भूल जाये
ये चाहें तो दुनिया को अपना बना लें
ये आक़ाओं * की हड्डियाँ तक चबा लें

कोई इनको एहसास-ए-ज़िल्लत * दिला दे
कोई इनकी सोयी हुई दुम हिला दे

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