अपने अफ़कार की, अशआ'र की दुनिया है यही...  

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ये खूँ की महक है के लब-ए-यार की ख़ुशबू
किस राह की जानिब से सबा आती है देखो
गुलशन में बहार आई, के ज़िन्दां * हुआ आबाद
किस सिम्त * से नग़मों की सदा आती है देखो
-- फ़ैज़



आज फ़ैज़ की इस महफ़िल में आप सब के लिये जो नज़्म ले कर आयी हूँ उसका शीर्षक है "मौज़ू-ए-सुख़न", जो उनके पहले संग्रह "नक्श-ए-फ़रियादी" से ली है. ये वो वक़्त था जब फ़ैज़ रूमानी शायरी ज़्यादा लिखा करते थे, हालाँकि हक़ीक़त और सामाजिक परिवेश और परिस्थितियों से उस वक़्त भी उनकी रचनायें अछूती नहीं रहा करती थीं, जैसा की इस नज़्म के बाद के हिस्से में भी देखा जा सकता है. पर ये फ़ैज़ के कलम का ही जादू था की वो इस ख़ूबसूरती से रूमान, फंतासी, हक़ीक़त और क्रांति को सम्मिश्रित करते थे की आज भी उन्हें पढ़ने वाला बरबस ही "वाह" कर उठता है...

इस नज़्म में उन्होंने बड़ी ही ख़ूबसूरती से एक शायर के दिल का हाल बताया है कि एक तरफ़ तो बेपनाह ख़ूबसूरत हसीनायें है और दूसरी तरफ़ भूख उगाते खेत और चूर हो कर बिख़रते ख़्वाब... वो ख़्वाब जो लोगों को जीने का हौसला देतें हैं... तो वो शायर क्यूँ ना उस ख़ूबसूरती के बारे में लिखे उन शोख हसीनाओं और उन ख़्वाबीदः आँखों और रंगीन रुखसार के बारे में लिखे... इससे बेहतर कोई और मौज़ूँ क्या होगा उसकी शायरी का.

आइये अब पढ़ते हैं और फिर सुनते हैं ये ख़ूबसूरत सी नज़्म बेग़म आबिदा परवीन जी की आवाज़ में -


गुल हुई जाती है अफ़सुर्दः * सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्म-ए-महताब * से रात
और मुश्ताक़ * निगाहों की सुनी जायेगी
और उन हाथों से मस * होंगे ये तरसे हुए हाथ

उनका आँचल है, कि रुखसार, कि पैराहन * है
कुछ तो है जिससे हुई जाती है चिलमन रंगीं
जाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम * घनी छाँव में
टिमटिमाता है वो आवेज़ः * अभी तक कि नहीं

आज फिर हुस्न-ए-दिलआरा * की वही धज होगी
वही ख़्वाबीदः * सी आँखें, वही काजल की लकीर
रंगे-रुख़सार पे हल्का सा वो गाज़े * का ग़ुबार
संदली हाथ पे धुंधली सी हिना की तहरीर *

अपने अफ़कार * की, अशआ'र की दुनिया है यही
जाने-मज़मूँ * है यही, शाहिद-ए-मानी * है यही

आज तक सुर्ख़-ओ-सियह सदियों के साये के तले
आदम-ओ-हव्वा की औलाद पे क्या गुज़री है
मौत और जीस्त की रोज़ान: सफ़आराई * में
हम पे क्या गुज़रेगी, अजदाद * पे क्या गुज़री है

इन दमकते हुए शहरों की फ़रावाँ मख़लूक़ *
क्यूँ फ़क़त मरने की हसरत में जिया करती है
ये हसीं खेत, फटा पड़ता है जोबन जिनका
किसलिए इनमें फ़क़त भूख उगा करती है

ये हर इक सिम्त पुर-असरार * कड़ी दीवारे
जल बुझे जिनमें हज़ारों की जवानी के चिराग़
ये हर इक गाम पे उन ख़्वाबों के मक़तलगाहें *
जिनके परतौ * से चिरागाँ हैं हज़ारों के दिमाग़

ये भी हैं ऐसे कई और भी मज़मूँ होंगे
लेकिन उस शोख़ के आहिस्ता से खुलते हुए होंठ
हाय उस जिस्म के कमबख्त दिलआवेज़ * ख़ुतूत
आप ही कहिये कहीं ऐसे भी अफ्सूँ * होंगे

अपना मौज़ू-ए-सुख़न * इनके सिवा और नहीं
तब-ए-शायर * का वतन इनके सिवा और नहीं


आज इक हर्फ़ को फिर ढूँढता फिरता है ख़्याल...  

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दिल रहीन-ए-ग़म-ए-जहाँ * है आज
हर नफ़ज़ * तश्न-ए-फुगाँ * है आज
सख्त वीरान है महफ़िल-ए-हस्ती
ऐ ग़म-ए-दोस्त तू कहाँ है आज
-- फैज़ 


फैज़ की महफ़िल में एक बार फिर आप सबका तह-ए-दिल से इस्तक़बाल है. आज तक आपको फैज़ की शायरी के अनेकों रंगों से रु-बा-रु करवा चुकी हूँ पर आज रोमांसवाद और देशप्रेम से हट कर जो नज़्म चुन के लायी हूँ आप सब के लिये वो एक शायर की उस कैफ़ियत को दर्शाती है जब वो अपने ख़्यालों को कागज़ पर उतारना तो चाहताहै पर उसे वो अक्षर... वो शब्द नहीं मिलते जो उसके ख़्यालों को, उसकी भावनाओं को सही शक्ल दे पायें...

"फैज़" अपनी शायरी की तरह ही व्यक्तिगत तौर पर भी एक बेहद मीठे इन्सान थे. उन्हें कभी किसी ने ऊँचा बोलते नहीं सुना चाहे वो रोज़ मर्रा की बातचीत हो या फिर मुशायरों में पढ़े जाने वाले उनके शेर. फैज़ के बारे में कहीं पढ़ा था की वो मुशायरों में भी इस तरह अपने शेर पढ़ते हैं कि जैसे उनके होंठों से अगर ज़रा ऊँची आवाज़ निकल गई तो ना जाने कितने मोती चकनाचूर हो जायेंगे. वो सेना में कर्नल रहे, जहाँ किसी नर्मदिल अधिकारी की गुंजाइश नहीं होती. उन्होंने कॉलेज में प्रोफेसरी करी जहाँ लड़के प्रोफ़ेसर तो प्रोफ़ेसर शैतान तक को अपना स्वभाव बदलने पर मजबूर कर दें. उन्होंने रेडियो में नौकरी करी, पत्रकारिता जैसा जोखिम भरा पेशा अपनाया फिर भी उनका ये स्वभाव ज्यूँ का त्यूँ रहा और फिर जब पाकिस्तान सरकार ने इस देवता स्वरुप व्यक्ति पर हिंसात्मक विरोध का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया तब भी मेजर मोहम्मद इसहाक़ ("फैज़" के जेल के साथी) के कथानुसार,

"कहीं पास-पड़ोस में तू-तू मैं-मैं हो, दोस्तों में तल्ख़-कलामी हो, या यूँ ही किसी ने त्योरी चढ़ा रखी हो, "फैज़" को तबियत ज़रूर ख़राब हो जाती थी और इसके साथ ही शायरी की कैफ़ियत (मूड) भी काफ़ूर हो जाती थी"

आज की ये ख़ूबसूरत सी नज़्म उनके संग्रह "शाम-ए-शहर-ए-याराँ" से ले गई है... पहले इसे पढ़ते हैं फिर सुनते हैं शशि कपूर और सुरेश वाडेकर जी की आवाज़ में, जिसे फिल्म "मुहाफ़िज़ - इन कस्टडी" में इस्तेमाल किया गया था. ये फिल्म अनीता देसाई जी के बुक्कर समान के लिये नामांकित उपन्यास "इन कस्टडी" पर आधारित है जिसके मुख्य पात्र हैं उर्दू के एक शायर "नूर". कहने की ज़रुरत नहीं की फिल्म बेहद अच्छी है और इसमें फैज़ की बहुत सी नज़्में इस्तेमाल करी गई हैं. आपने नहीं देखी तो ज़रूर देखिये एक बार. पर फिलहाल फैज़ साहब के पास लौटते हैं और पढ़ते हैं ये ख़ूबसूरत सी नज़्म.


[ 1 ]

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँढता फिरता है ख़्याल
मध भरा हर्फ़ कोई, ज़हर भरा हर्फ़ कोई
दिलनशीं हर्फ़ कोई, क़हर भरा हर्फ़ कोई
हर्फ़-ए-उल्फ़त कोई दिलदार-ए-नज़र हो जैसे
जिस से मिलती है नज़र बोसा-ए-लब की सूरत
इतना रौशन के सर-ए-मौजा-ए-ज़र * हो जैसे
सोहबत-ए-यार में आगाज़-ए-तरब * की सूरत
हर्फ़-ए-नफ़रत कोई शमशीर-ए-ग़ज़ब * हो जैसे
ता-अबद * शहर-ए-सितम जिससे तबाह हो जाएँ
इतना तारीक़ * के शमशान की शब हो जैसे
लब पे लाऊँ तो मेरे होंठ सियह हो जाएँ

[ 2 ]

आज हर सुर से हर इक राग का नाता टूटा
ढूँढती फिरती है मुतरिब * को फिर उसकी आवाज़
जोशिश-ए-दर्द * से मजनूँ के गरेबाँ की तरह
आज हर मौज हवा से है सवाली ख़िलक़त *
ला कोई नग़मा कोई सौत * तेरी उम्र दराज़
नौहा-ए-ग़म * ही सही शोर-ए-शहादत * ही सही
सूरे-महशर * ही सही बाँग-ए-क़यामत * ही सही

जुलाई, 1977




नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही...  

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हज़ार दर्द शब-ए-आरज़ू की राह में हैं
कोई ठिकाना बताओ के काफ़िला उतरे
क़रीब और भी आओ के शौक़-ए-दीद * मिटे
शराब और पिलाओ के कुछ नशा उतरे
-- फैज़

फैज़ की इस महफ़िल में आज उनकी एक बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल "नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही" ले कर आयें हैं, ये ग़ज़ल उनकी असंकलित ग़ज़लों की श्रेणी में आती है, असंकलित इसलिए कि उनके किसी भी संग्रह में नहीं पायी जाती है. सुप्रसिद्ध गायिका बेग़म आबिदा परवीन ने फैज़ की इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ से नवाज़ा था, "फैज़ बाय आबिदा" नाम के एक एल्बम के लिये. तो आज हम इस ग़ज़ल को पढ़ेंगे भी और सुनेंगे भी पर उससे पहले चंद बातें इस ग़ज़ल, फैज़ की लेखनी और फैज़ के बारे में.

फैज़ की लेखनी में जो टशन था, बात को कहने का जो अंदाज़ था वो इस ग़ज़ल में बड़े ही बेहतरीन तरीक़े से उभर के आया है. अपनी बात को कहने का ये अंदाज़ ही फैज़ को उनके ज़माने के अन्य शायरों से जुदा करता है और यही कारण है कि उर्दू शेर-ओ-सुख़न के इतिहास में फैज़ को एक मुख्तलिफ़ और बेहद ऊँचा मक़ाम हासिल है, जिसे पिछले तकरीबन पचास सालों में भी कोई नहीं छू पाया है.

उर्दू के एक आलोचक मुमताज़ हुसैन के कथनानुसार -

"उसकी शायरी में अगर एक परम्परा क़ैस (मजनूं) की है तो दूसरी मन्सूर ** की. "फैज़" ने इन दोनों परम्पराओं को अपनी शायरी में कुछ इस प्रकार समो लिया है कि उसकी शायरी स्वयं एक परम्परा बन गई है. वह जब भी महफ़िल में आया, एक छोटी-सी पुस्तक, एक क़तआ, ग़ज़ल के कुछ शेर, कुछ यूँ-ही सा काव्य-अभ्यास और कुछ क्षमा-याचना की बातें ले कर आया, लेकिन जब भी आया और जैसे भी आया, खूब आया..."

** एक प्रसिद्ध ईरानी वाली जिनका विश्वास था की आत्मा और परमात्मा एक ही हैं और उन्होंने 'अनल-हक़' (सोऽहं - मैं ही परमात्मा हूँ) की आवाज़ उठाई थी. उस समय के मुसलमानों को उनका यह नारा अधार्मिक लगा और उन्होंने उन्हें फांसी दे दी.


नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू * ही सही
नहीं विसाल * मयस्सर * तो आरज़ू ही सही

न तन में ख़ून फ़राहम * न अश्क़ आँखों में
नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब * है बे-वज़ू * ही सही

यही बहुत है के सालिम * है दिल का पैराहन *
ये चाक़-चाक़ * गरेबाँ बे-रफ़ू * ही सही

किसी तरह तो जमे बज़्म * मयक़दे वालों *
नहीं जो बादा-ओ-साग़र * तो हा-ओ-हू * ही सही

गर इन्तज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल
किसी के वादा-ए-फ़र्दा * की गुफ़्तगू * ही सही

दयार-ए-ग़ैर * में महरम * अगर नहीं कोई
तो 'फ़ैज़' ज़िक्र-ए-वतन अपने रू-ब-रू * ही सही



आइये अब इस ग़ज़ल को सुनते हैं बेग़म आबिदा परवीन जी की आवाज़ में, उम्मीद है आपको भी पसंद आएगी -  



जो रुके तो कोहे-गराँ थे हम, जो चले तो जाँ से गुज़र गये...  

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दूर जा कर क़रीब हो जितने
हमसे कब तुम क़रीब थे इतने
अब न आओगे तुम न जाओगे
वस्ल-ओ-हिज्राँ * बहम * हुए कितने
-- फैज़


यूँ तो अपनी शायरी में और अपने चाहने वालों के दिलों में फैज़ आज भी ज़िन्दा हैं और हमेशा रहेंगे पर इस दुनिया से रुख़सत लिये हुए आज उन्हें पूरे छब्बीस साल हो गये. आज फैज़ की छब्बीसवीं बरसी पर आइये उन्हें याद करते हैं और एक छोटी सी श्रद्धांजलि देते हैं.

20 नवम्बर 1984 की दोपहर एक लम्बी बीमारी के बाद इस दुनिया को अलविदा कर फैज़ की क़लम और फैज़ दोनों हमेशा के लिये ख़ामोश हो गये... पर उनके इन्तेक़ाल के इतने बरस गुज़र जाने के बाद भी फैज़ की शायरी आज भी साँस लेती है और उनकी रूह आज भी ताज़ातन है हम सबके दिलों में. फैज़ को जितनी शोहरत अपने जीवनकाल में मिली उससे कहीं ज़्यादा इज्ज़त और शोहरत उसके बाद मिली.

फैज़ की शायरी एक बाक़ायदा "स्कूल ऑफ़ थॉट" का दर्जा रखती है. उर्दू शायरी से लगाव रखने वाला शायद ही कोई ऐसा शक्स होगा जो फैज़ की शायरी से प्रभावित ना हुआ हो. फिर चाहे वो हम और आप हों या कि आज के दौर के नामी गिरामी शायर और लेखक. आइये सुनते हैं जावेद अख्तर साहब, गुलज़ार साहब और ज़ेहरा नेगहा जी का फैज़ के बारे में क्या कहना है.




फैज़ की शायरी सिर्फ़ शायरी नहीं है उसका एक ख़ास मतलब है उनके पाठकों के लिये. वह सही मायनों में ज़िन्दगी की शायरी है - उसकी समग्रता का गर्माहट-भरा राग. लोग उसे दिल की गहराइयों से प्यार करते हैं और ज़िन्दगी के अहम मोड़ों पर उससे रौशनी पाते हैं.

फैज़ को श्रद्धांजलि देने की इस कड़ी में आइये आज पढ़ते हैं उनकी एक बेहद ख़ूबसूरत नज़्म "ढाका से वापसी पर" उनके कविता संग्रह "शाम-ए-शहर-ए-याराँ" से और उसके बाद इसी नज़्म को दो अलग लोगों से दो अलग अंदाज़ में सुनेंगे.


हम के ठहरे अजनबी इतनी मदारातों * के बाद
फिर बनेंगे आशना * कितनी मुलाक़ातों के बाद

कब नज़र में आयेगी बे-दाग़ सब्ज़े * की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

थे बहुत बे-दर्द लम्हें ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ * के
थीं बहुत बे-महर * सुबहें मेहरबाँ रातों के बाद

दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल * ने मोहलत * ही न दी
कुछ गिले-शिकवे भी कर लेते मुनाजातों * के बाद

उन से जो कहने गये थे "फ़ैज़" जाँ सदक़ा * किये
अनकही ही रह गई वो बत सब बातों के बाद

1974
शाम-ए-शहर-ए-याराँ

आइये अब इस नज़्म को सुनते हैं नय्यारा नूर जी की दिलकश आवाज़ में -


और अब इसी नज़्म का एक बिलकुल अलग अंदाज़ मुज़फ्फर अली जी के एल्बम "पैग़ाम-ए-मोहब्बत" से. मुज़फ्फ़र साहब ने बिलकुल अलग तरह का प्रयोग किया है इस नज़्म के साथ, उसे क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम की बंगाली कविता "मोनी पोड़े आज शे कोन" के साथ मिला कर. अब इसे फैज़ और नज़रुल के कलम का जादू कहिये या मुज़फ्फ़र साहब के संगीत की जादूगरी या फिर उस्ताद मोईन ख़ान और शोर्जू भट्टाचार्य जी की आवाज़ का कमाल कि दोनों ही गीत कुछ ऐसे घुल मिल गये हैं आपस में कि उर्दू और बंगाली का अंतर ही मिट गया है. सुनिये और ख़ुद ही महसूस कीजिये जो हम शब्दों में समझा नहीं पा रहे शायद...


चलते चलते बस इतना ही कहूँगी कि फैज़ को इतना पढ़ने समझने के बाद भी लगता है पता नहीं कितना समझ पायें हैं उनको, और जो भी समझा है क्या सही समझा है, क्या वही समझा है जो वो कहना चाह रहे थे...


जो रुके तो कोहे-गराँ * थे हम, जो चले तो जाँ से गुज़र गये
रहे-यार हमने क़दम क़दम तुझे यादगार बना दिया...


हमीं से सुन्नत-ए-मंसूर-ओ-क़ैस ज़िन्दा हैं...  

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हमारे दम से है कू-ए-जुनूँ * में अब भी ख़जल *
अबा-ए-शेख़-ओ-क़बा-ए-अमीर-ओ-ताज-ए-शही *
हमीं से सुन्नत-ए-मंसूर-ओ-क़ैस * ज़िन्दा हैं
हमीं से बाक़ी है गुलदामनी-ओ-कजकुलही *

-- फैज़

आज आप सब के लिये फैज़ की एकदम अलग तरह की नज़्म से ले कर आये हैं. रोमांसवाद से पूर्णतयः मुक्त जिसे पढ़ कर आप शायद समझ सकें की फैज़ के कलम की ताकत से पाकिस्तान की सरकार किस कदर खौफ़ खाती थी. फैज़ की शायरी में जो पूरी अवाम के जज़्बातों को एक साथ झंकझोर देने की कला थी उसी के चलते उन्हें अपने जीवनकाल में तमाम बार जेल हुई और देश निकाला मिला... क्यूँकि सरकार को डर था की गर फैज़ यूँ ही लिखते रहे तो अवाम बाग़ी हो जायेगी.

उर्दू क्लासिकल शायरी के मुहावरों और हुस्न के रसाव से विपरीत एकदम अलग तरह की उपमाओं और प्रतीकों से सजी आज की नज़्म "कुत्ते" उनके पहले कविता संग्रह "नक्श-ए-फ़रियादी" से ली है. यहाँ कुत्ते उन बेघर लोगों के प्रतीक हैं, जो अपनी रातें फुटपाथ पर बिताते हैं, आवारा घूमते हैं, ज्यों-त्यों पेट भरते हैं और सबकी फटकार सहते हैं. इनमें ज़िन्दगी का यथार्थ भी है और ज़िन्दगी को बदलने की प्रबल इच्छा भी है. यह शायरी जहाँ मध्य वर्ग के असंतुष्ट युवकों को पसंद आती है, वहाँ उच्च वर्ग को भी अखरती नहीं क्यूँकि ये आवारा कुत्ते कभी बगावत नहीं करते, दुम हिलाओ तो ज़्यादा-से-ज़्यादा भौंकते हैं और फिर चुप हो जाते हैं.

ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
के बख्शा गया जिनको ज़ौक-ए-गदाई *
ज़माने की फटकार सरमाया * इन का
जहाँ भर की दुत्कार इनकी कमाई

न आराम शब की न राहत सवेरे
गिलाज़त * में घर, नालियों में बसेरे
जो बिगड़ें तो इक दूसरे से लड़ा दो
ज़रा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो
ये हर एक की ठोकरें खाने वाले
ये फ़ाकों * से उकता के मर जाने वाले

ये मज़लूम मखलूक * गर सर उठाये
तो इन्सान सब सरकशी * भूल जाये
ये चाहें तो दुनिया को अपना बना लें
ये आक़ाओं * की हड्डियाँ तक चबा लें

कोई इनको एहसास-ए-ज़िल्लत * दिला दे
कोई इनकी सोयी हुई दुम हिला दे

दोस्तों बज़्म सजाओ के बहार आयी है...  

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आ गई फ़स्ल-ए-सुकूँ चाक़ गरेबाँ वालों
सिल गये होंठ, कोई ज़ख्म सिले या न सिले
दोस्तों बज़्म सजाओ के बहार आयी है
खिल गये ज़ख्म, कोई फूल या न खिले
-- फैज़


"फूलों की शक्ल और उनकी रंग-ओ-बू से सराबोर शायरी से भी अगर आँच आ रही है तो यह मान लेना चाहिये कि फैज़ वहाँ पूरी तरह मौजूद हैं. फैज़ की शायरी की ख़ास पहचान ही है - रोमानी तेवर में भी ख़ालिस इन्क़लाबी बात." कितनी सही बात लिखी है प्रतिनिधि कविताओं में फैज़ की शायरी के बारे में.

आज आप सबकी पेश-ए-नज़र "शाम-ए-शहर-ए-याराँ" से फैज़ की एक बेहद ख़ूबसूरत नज़्म ले कर आये हैं. जो हमारी पसंदीदा है शायद तब से जब फैज़ को समझना भी शुरू नहीं करा था, सिर्फ़ इसे सुना था टीना सानी जी की आवाज़ में, सही बताऊँ तो तब ये भी नहीं पता था की टीना सानी नाम की कोई मशहूर पाकिस्तानी गायिका भी हैं जिन्होंने इस नज़्म को इस ख़ूबसूरती से गया है. ख़ैर नज़्म बाद में सुनते हैं पहले कुछ बात फैज़ साहब के बारे में...

फैज़ की शायरी के बहुआयामी फ़लक के बारे में उर्दू के एक बुज़ुर्ग शायर 'असर' लखनवी साहब कहते हैं -

"फैज़ की शायरी तरक्क़ी के मदारिज (दर्जे) तय करके अब इस नुक्ता-ए-उरूज (शिखर-बिंदु) पर पहुँच गई है, जिस तक शायद ही किसी दूसरे तरक्की-पसंद शायर की रसाई हुई हो. तख़य्युल (कल्पना) ने सनाअत (शिल्प) के जौहर दिखाए हैं और मासूम जज़्बात को हसीन पैकर (आकार) बक्शा है. ऐसा मालूम होता है की परियों का एक गौल (झुण्ड) एक तिलिस्मी फ़ज़ा (जादुई वातावरण) में इस तरह से मस्त-ए-परवाज़ (उड़ने में मस्त) है कि एक पर एक की छूत पड़ रही है और कौस-ए-कुज़ह (इन्द्रधनुष) के अक्क़ास (प्रतिरूपक) बादलों से सबरंगी बारिश हो रही है....."

फैज़ की शायरी की इस ख़ूबसूरत तारीफ़ के फ़लक को आइये थोड़ा और कुशादा करते हैं और पढ़ते और सुनते हैं उनकी ये ख़ूबसूरत नज़्म "बहार आई" जो एक पंक्ति में बोला जाये तो बस इतना सा मतलब है की वो सारे ज़ख्म, वो सारे दर्द जो किसी के जाने से मिले थे, बीता हुआ समय जिन्हें मद्धम कर चुका था, बहार के आने से एक बार फिर खिल उठे हैं, हरे हो गये हैं... पर ये फैज़ के शब्दों का ही जादू है की दर्द भी कितना ख़ूबसूरत लग रहा है उनसे सज के...

बहार आई तो जैसे एक बार
लौट आये हैं फिर अदम * से
वो ख़्वाब सारे, शबाब सारे
जो तेरे होंठों पे मर मिटे थे
जो मिट के हर बार फिर जिये थे
निखर गये हैं गुलाब सारे
जो तेरी यादों से मुश्कबू * हैं
जो तेरे उश्शाक़ * का लहू हैं

उबल पड़े हैं अज़ाब * सारे
मलाल-ए-एहवाल-ए-दोस्ताँ * भी
ख़ुमार-ए-आग़ोश-ए-महवशां * भी
गुबार-ए-ख़ातिर के बाब * सारे
तेरे हमारे
सवाल सारे, जवाब सारे
बहार आई तो खुल गये हैं
नये सिरे से हिसाब सारे !


- अप्रैल, 1975
शाम-ए-शहर-ए-याराँ





मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब ना माँग...  

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न आज लुत्फ़ कर इतना के कल गुज़र न सके
वो रात जो के तेरे गेसुओं की रात नहीं
ये आरज़ू भी बड़ी चीज़ है मगर हमदम
विसाल-ए-यार फ़क़त आरज़ू की बात नहीं
-- फैज़

फैज़ की इस बज़्म-ए-सुख़न में आज उनकी जिस नज़्म को आपके रु-बा-रु ले कर आयें हैं वो "नक्श-ए-फ़रियादी" के दूसरे भाग से ली गयी है. यानी 1935 के बाद की रचना है. ये वो दौर था जब फैज़ की लेखनी रोमांसवाद की नर्मी को छोड़ कठोर भौतिकवाद की तरफ़ रुख कर चुकी थी.

वो दौर जब समूचा विश्व 1930 की विश्व मंदी से गुज़र रहा था. उस दौर के हालात, किसानों और मजदूरों के आन्दोलन और 1936 में मुंशी प्रेमचंद, सज्जाद ज़हीर और मौलवी अब्दुल हक़ के नेतृत्व में प्रगतिशील आन्दोलनों के शुभारम्भ इस नौजवान शायर के ह्रदय व मस्तिष्क को इस कदर झंझोड़कर रख देते हैं की वो ऊँचे स्वर में ये घोषणा करता है - "अब मैं दिल बेचता हूँ और जान खरीदता हूँ" *

* "दिल ब-फ़रोख्तम जाने ख़रीदम" - ' निज़ामी ' की फ़ारसी पंक्ति

और "नक्श-ए-फ़रियादी" के दूसरे भाग की शुरुआत होती है "मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब ना माँग" जैसी नज़्म के साथ, जो उस दौर के नौजवानों की आवाज़ बन गयी थी. ये एक ऐसी नज़्म है जिसे रोमान और यथार्थ का, प्यार और कटुता का सुन्दर सामंजस्य कहा जा सकता है. तो आइये पढ़ते हैं इस नज़्म को और जानते हैं कि कैसे वास्तविकता और हालात एक शायर की रोमानवी शायरी को हक़ीक़त का जामा पहना कर यथार्थवादी बना देते हैं.


मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब ना माँग
मैंने समझा था के तू है तो दरख़्शां * है हयात *
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का * झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में * बहारों को सबात *
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है


तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये *
यूँ ना था, मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें हैं और भी हैं वस्ल की राहत * के सिवा


अनगिनत सदियों से तारीक बहीमाना तिलिस्म *
रेशम-ओ-अतलस-ओ-किमख़्वाब * में बुनवाये हुए
जा-ब-जा * बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों * से
पीप * बहती हुई गलते हुए नासूरों * से


लौट जाती है इधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग !


फैज़ की इस नज़्म को अपनी मखमली आवाज़ दी थी मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ जी ने और उसे सुनने के बाद फैज़ ने कहा था "नूरजहाँ अब ये हमारी नहीं रही तुम्हारी हो गयी..." आइये हम भी सुनते हैं और जानते हैं फैज़ साहब ने ऐसा भला क्यूँ कहा...

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