तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी, तेरे जाँ-निसार चले गये...  

Posted by richa in ,

रफ़ीक-ए-राह थी मंज़िल हर इक तलाश के बाद
छुटा ये साथ तो रह की तलाश भी ना रही
मलूल था दिल-ए-आइना हर ख़राश के बाद
जो पाश-पाश हुआ इक ख़राश भी ना रही

-- फ़ैज़

एक लम्बे वक्फे के बाद आज फ़ैज़ की महफ़िल फिर सजाई है. और आज आपके लिये लायी हूँ फ़ैज़ पर प्रणय कृष्ण जी द्वारा लिखे गये एक लेख का छोटा सा अंश और साथ में "दस्त-ए-तह-ए-संग" से एक ख़ूबसूरत सी ग़ज़ल.

रूमानियत और फ़ैज़ की शायरी : एक जिरह - प्रणय कृष्ण

"फ़ैज़" की शायरी अपने पाठकों और श्रोताओं में पहले से मौजूद कुछ जज़्बातों, सपनों, यादों और रिश्तों को जगा देती है. फ़ैज़ की काव्यभाषा मन्त्रों की तरह जनसमुदाय की भावनाओं और अनुभवों का आह्वाहन करती है, भूले हुए एहसासों को जगाती है, दिल में गहरे दफ़्न संवेदनाओं को पुकारती है और उन्हें एक ऐसी काव्यात्मक संरचना प्रदान करती है कि लोगों को उसमें अपने जीवन का मायने-मतलब और मूल्य समझ में आता है. उनकी पूरी शायरी अवाम के साथ एक ऐसा संवाद है जो अवाम की चेतना के दबा दिये गए हिस्सों से रु-ब-रु है. कोई भी फ़ैज़ का पैसिव श्रोता नहीं हो सकता. उन्हें सुनने वाली अवाम, उन्हें पढ़ने वाला पाठक उनकी शायरी में मानी, अर्थ भरता है. ये वो चीज़ है जो फ़ैज़ की शायरी के अवामी और जम्हूरी चरित्र को समझने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है. उनकी शायरी एक चुम्बक है जिससे खिंचकर न जाने कितने अनुभव जुड़ जाते हैं. जो बात पैदा होती है, वह है एक ऐसी शायरी जो हमें आमंत्रित करती है कि हम सब उसमें अपने अनुभव मिला दें. फ़ैज़ का पाठक या श्रोता यह एहसास किये बगैर नहीं रह सकता कि वो उनकी शायरी में शामिल है. अवाम के दिलों में ग़ज़ल के साथ रिश्ता, उसके प्रतीक विधान और माहौल के साथ बाबस्तगी पारंपरिक तौर पर गहरी थी. फ़ैज़ के लिये ये एक महत्वपूर्ण बात थी और उन्होंने ग़ज़ल के ढाँचे को लेकर एक आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में एहतेजाज कि महान शायरी को अंजाम दिया. जदीदियत के महान स्तम्भ नून मीम राशिद अगर इस बात को नहीं समझ सके तो कोई ख़ास आश्चर्य की बात नहीं. क्यूँकि साहित्य का वह कोई भी विमर्श जो रूप को ही वस्तु का दर्जा देता है "फ़ैज़" के साथ न्याय नहीं कर सकता. हिंदी में आज भी गीत और गीतकार साहित्य की दुनिया में दूसरे दर्जे के नागरिक हैं. लेकिन लोकप्रिय प्रतीरोध के लिये हिंदी में दुष्यंत कुमार, गोरख पाण्डेय वगैरह ने अगर ग़ज़ल को फिर से मुफीद पाया तो इसके पीछे फ़ैज़ जैसों के कारनामों की ही विरासत थी. हिंदी में आज भी कुछ लोग समझते हैं कि ताल, छंद, तुक, लय वगैरह ऐसे काव्य उपकरण हैं, जिनका यथार्थ के लिये पुनरुद्धार संभव नहीं है. इसे जदीदियत का ही वर्चस्व समझना चाहिये, जो रूप के स्तर पर मनोग्रस्त है.

प्रतीक से इतर, ख़ालिस इश्क़ और हुस्न की बात करते हुए "फ़ैज़" ने कहीं भी आत्मग्रस्त मानसिकता का परिचय नहीं दिया, जो कि औसत पारंपरिक ग़ज़ल और रूमानी शायरी का समान तत्व है. "फ़ैज़" के रूप में एक ऐसा शायर हमारे सामने है, जो प्रिय पात्र पर किसी अधिकार कामना से संचालित नहीं है. जबकि यह अधिकार कामना ही है जो रोमैंटिक एगोनी का स्रोत है. "फ़ैज़" आमतौर पर प्रियपात्र को महज़ निमित्त मानकर सिर्फ़ प्रेमी की प्रतिक्रियाओं के तंग घेरे में नहीं विचरते. वे तो प्रियपात्र की तस्वीर ऐसी खड़ी करते हैं कि वह हर किसी का प्रियपात्र हो जाये और ऐसा कर के वे सूफ़ियों की याद दिलाते हैं. ये भावनाओं की दुनिया में लोकतंत्र की इन्तेहा है. इसलिए "रकीब से" जैसी नज़्म वे ही लिख सकते थे. जहाँ रूमानियत में महबूब की जगह आशिक़ की अपनी ही दुनिया प्रधान होती है वहीं फ़ैज़ के यहाँ महबूब का असर प्रधानता पाता है -

वह तो वह है, तुम्हें हो जायेगी उल्फ़त मुझसे
इक नज़र तुम मेरा महबूब-ए-नज़र तो देखो

महबूब को, उसके वस्तुगत व्यक्तित्व को इतनी तरजीह भला पारंपरिक ग़ज़ल में कैसे मिल सकती थी ! जब "फ़ैज़" महबूब के नक्श उकेरते हैं तो जहीद आलोचक को उसमें सिर्फ़ "ऐन्द्रिय इफेक्ट" नज़र आता है. लेकिन संवेदना का बदलाव नहीं, जो एक साथ सुफ़ियाना और आधुनिक दोनों है. फ़ैज़ जब ये नक्श उभारते हैं तो वह रीतिकालीन "नख-शिख" उपभोग नहीं होता. बल्कि ज़िन्दगी के तमाम तजुर्बों से उलझते हुए, फैलते हुए दायरे का असर रखता है -
दश्त-ए-तन्हाई में, ऐ जान-ए-जहाँ लरजाँ हैं
तेरी आवाज़ के साये, तेरे होंठों के सराब
दश्त-ए-तन्हाई में, दूरी के खस-ओ-खाक़ तले
ख़िल रहे हैं तेरी पहलू के समन और गुलाब
उठ रही है कहीं कुर्बत से तेरी साँस की आँच
अपनी ख़ुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम
दूर उफ़क पार, चमकती हुई क़तरा क़तरा
गिर रही है तेरी दिलदार नज़र की शबनम
(दस्त-ए-सबा से)

इस नज़्म में दूरी ही सब कुछ कहती है. हुस्न का असर दूरी के चलते ही सब पर यकसां पड़ता है. यहाँ महबूब दूर होने के बावजूद इस क़दर छाया हुआ है कि उसे चाहने वाले का ईगो कोई महत्त्व नहीं रखता. वो तो ख़ुद निमित्त है. सारी क़ायनात के सामने उस जमाल को लाने का. यह तरीका रूमानियत से ठीक उलट काव्य भंगिमा है.

साभार : आजकल हिंदी पत्रिका - फ़ैज़ जन्मशती विशेषांक

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आइये अब पढ़ते हैं "दस्त-ए-तह-ए-संग" से एक बेहतरीन ग़ज़ल और फिर उसे सुनते हैं दो अलहदा आवाज़ों में दो अलग अंदाज़ लिये हुए.
तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी, तेरे जाँ-निसार चले गये
तेरी रह में करते थे सर तलब, सरे-रहगुज़ार चले गये

तेरी कज-अदाई से हार के शब-ए-इंतज़ार चली गयी
मेरे ज़ब्त-ए-हाल से रूठकर मेरे ग़मगुसार चले गये

न सवाल-ए-वस्ल न अर्ज़-ए-ग़म, न हिकायतें न शिकायतें
तेरे अहद में दिल-ए-ज़ार के सभी इख्तियार चले गये

ये हमीं थे जिनके लिबास पर सर-ए-रू सियाही लिखी गयी
यही दाग़ थे जो सजा के हम सर-ए-बज़्म-ए-यार चले गये

न रहा जुनून-ए-रुख़-ए-वफा, ये रसन ये दार करोगे क्या
जिन्हें ज़ुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था वो गुनाहगार चले गये
जुलाई, 1959

पहले आबिदा परवीन जी की आवाज़ में -


और अब शौक़त अली साहब के अंदाज़ में -

This entry was posted on June 22, 2011 at Wednesday, June 22, 2011 and is filed under , . You can follow any responses to this entry through the comments feed .

4 comments

बिना लेख पढ़े ये लिख रहा हूँ, क्योंकि अगर उसकी पकड़ में आ गया तो अपना भूल जाऊँगा.

इन दिनों फैज़ को खूब पढ़ा, नहीं इन दिनों फैज़ पर खूब पढ़ा. गीतकार इरशाद कामिल का लेख कि फैज़ कैसे फ़िल्मी दुनिया के गीतों में भी आते हैं. फैज़ का दखल इतना नेचुरल है जैसे कभी राजेंदर कुमार ने कहा था "कोई एक्टर अपने दिल पर हाथ रख कर कह दे कि उसने दीलिप साब को कॉपी नहीं कि हो" या फिर अजय देवगन कहते हैं "अमिताभ कि अदायगी आने अनजाने हमारे जीवन में शामिल है"

फैज़ विरले शायर थे, ग़ालिब के लम्बे अरसे बाद एक दौर चला था फैज़, मजाज़ का ये बड़े मशहूर हुए... फैज़ को तो खैर कोई नहीं छू पाया. ग़ालिब के सबसे चुनौती भरे शेर कह जाने के बाद फैज़ ही हैं जो कलम कि नोक लगते हैं.

उनके कहने में शब्द किसी कुंदन के माफिक तपे हुए होते हैं.

June 22, 2011 at 6:21 PM

आपके फैज-प्रेम ने प्रभावित किया।

June 27, 2011 at 2:16 PM

फ़ैज़ की शायरी और आबिदा परवीन जी की आवाज़ ..........और क्या कहना .. बेहतरीन....

June 27, 2011 at 10:20 PM

bahut sundar prayas. nayee gazle aur najme upload karte rhiye.

June 27, 2013 at 1:30 PM

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